मेरा साईकल प्रेम

कुछ वर्ष पूर्व रोग और मोटापे से जूझते जूझते आयुर्वेद का सहारा मिला और गुणवान आयुर्वेदाचार्यों के मार्गदर्शन से मेरा जीवन पूर्णत: प्रभावित हो गया है। इस संदर्भ मे मैं कानपुर के त्रिपाठी औषधालय, परमठ, कानपुर का विशेष तौर से आभारी हूँ। एक समय ऐसा भी था जब मेरा निज भार ११० किलो के ऊपर था, हर एक कदम पर साँस फूलता था और हर दिन दवा और सूई के सहारे पार पाता था। आज मै एक ऐसा नौजवान हूँ, जो कई सौ किलोमीटर साईकल चलाने पर भी नहीं थकता और २०-३० किलोमीटर की दौड़ मे भाग लेता हूँ। मेरी आयु ४८ वर्ष है और भार लगभग ७५ किलो और मेरा निवास खास कानपुर शहर मे है।

आयुर्वेदाचार्यों के मार्गदर्शन से यह ज्ञान प्राप्त हुआ की एक भिक्षूक समान सादगी से भरा जीवन ही स्वस्थता का मूल मंत्र है। भोजन जितना सादा हो, उतना ही पाचन योग्य होता है और पाचन ही जीवन है। कूलर, ए.सी. एवं फ्रिज स्वास्थ के लिये ठीक नहीं हैं, और फ़ास्ट फूड तो अतयन्त हानिकारक होता है। २०१५ मे मैने आयुर्वेद को अपनाया, आयुर्वेद एक जीवन शैली है, और कुल ६-८ महीने के अंदर ही मै ११० किलो से ८० किलो पहुंच गया, मैने दौड़ना और साईकल चलाना भी इसी वक्त आरम्भ किया। दौड़ने से कुछ चोट आई जिसके उपरान्त मैने साईकल पर विशेष ध्यान दिया।

साईकल का किस्सा बड़ा हास्यास्पद है। जब मैने साईकल लेने का मन बनाया तो घर वालों और रिश्ते-नातेदारों को जैसे सांप सूंघ गया, हमारे शहरी समाज मे साईकल पर चलना स्टेटस को नीचे करने के जैसा है। परन्तु मै नही माना और लगभग पांच हज़ार रुपय की रेंजर साईकल खरीद ली। यह बात २०१६ की है, तब मै साईकल का क,ख,ग, नही जानता था और बड़ा साहस करके १०-२० किलोमीटर का सफर तय कर पाता था। ऐसे मे मैने अपनी रेंजर मे गीयर भी लगवा लिये परन्तु इनका सही उपयोग सीखने मे ४-६ महीने का कठिन परिश्रम करना पड़ा। बीच-बीच मे गीयर टूट भी जाते थे और बनवाने का १२००/- रुपल्ली लगता था, धीरे-धीरे मैने यू-ट्यूब और अन्य मध्यमो की सहायता से स्वयं ही गीयर ठीक करना जान लिया। 

देसी गीयर के पूरे सामान का मूल्य ५००/- से १०००/- रुपये था, जापानी शिमानो अथवा विदेशी गीयर का पूरा सामान १०,००० /- से लेकर १,००,०००/- रुपये तक का होता था। ऐसे मे मै देशी और विदेशी गीयर के सामान को मिश्रित करके अपनी साईकल को चलाने लगा। यह सब काम जानने के बाद मुझे साईकल से ऐसा प्रेम हो गया की जिसका वर्णन करना कठिन है। अपनी साईकल से न तो विषाक्त धूएं का उत्सर्जन होता है और न ही वो तीव्र गति जिससे सड़क हादसे होते रहते हैं, मोटापा भी दूर भागने लगता है। अब और क्या कहूँ ? धीरे-धीरे टायर पंचर बनाना भी सीख गया और पुरी साईकल खोल कर उसके एक-एक अंजर-पंजर को बदलना या तेल-ग्रीस डालना और सफाई करने की कला मे भी निपुण हो गया। इस कार्य मे पास ही के देसी साईकल मिस्त्रीयों का भी कुछ सहयोग मिला।

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मेरी रेंजर गाड़ी जिसका पूरी तरह रूपान्तरण हो चुका है।

अब मेरे सफर ४०-८० कि.मी. तक होने लगे थे, अधिक्तम गति भी ३०-४० कि.मी. प्रति घँटे की होने लगी। गति बढ़ाने के लिये मैने एक और हल्की रेसिंग साईकल लगभग ५०००/- रुपये मे ले ली। इसमे भी आरम्भ मे ६ और फिर २१ गीयर लगवा लिये। अब मै १००-२०० कि.मी. की दूरी एक ही दिन मे करने लगा, और मेरी अधिकतम गति भी ४०-४५ कि.मी. प्रति घँटा हो गयी थी। ऐसे मे २०१७ के आते आते मैने कानपुर के आस पास के शहरो मे साईकल से जाना आरम्भ किया। इस श्रेणी मे मैने लखनऊ, कन्नौज और फतेहपुर को अपनी साईकलों की पहुँच मे लिया, फिर दायरा और बढ़ाया और प्रयागराज, हमीरपुर और आगे के गाँव और कसबों तक जाने लगा। बुँदेलखण्ड से मेरा विशेष लगाव रहा था और मैने अपना पहली बड़ी यात्रा मे मध्य-प्रदेश के खजुराहो जाने का प्रोग्राम बनाया। यह कोई संयोग नही था कि खजुराहो तक पहुँचने के लिये मुझे बुँदेलखण्ड के मध्य से जाना था। 

खजुराहो और उससे भी आगे महाराष्ट्र तक के साईकल सफर के किस्से मेरे अन्य लेखों मे पढ़ें।

 

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