घुम्मक्कड़ी साईकल

साईकल की कला समझने के बाद मानो मुझे पर लग गये थे। ऐसा लगता था की अब तो बस ब्रम्हाण ही मेरी मुट्ठी मे समा गया हो। मैने हर हफ्ते १-२ लम्बी दूरी की साईकल यात्राएँ आरम्भ कर दीं। अब मै अपनी मस्त चाल मे देहात की अपेक्षाकृत स्वच्छ वायु का आनन्द ले सकता था। २०१७ मे शीत काल के आते-आते कई सौ किलोमीटर की दूरी पूरी कर चुका था। आरम्भ मे तो आस पास के छोटे कस्बो मे मेरी लम्बी दूरी की साईकल यात्रा को देख कर लोगों को बड़ा कौतूहल होता था, लेकिन अब मेरी सवारी को लगभग कानपुर के आस पास सभी ढ़ाबे और साईकल वाले पहचानने लगे हैं। 

सवाल भी बड़े हास्यास्पद होते हैं। ‘आपको क्या सरकार साईकल पर घूमने का पैसा देती है ?’ ‘यह क्या कोई नई कम्पनी की साईकल का प्रदर्शन है ?’ ‘तुम क्या साईकल किसी संदेश का प्रचार करने को चलाते हो ?’ शहरों और कस्बों मे जब जवान बच्चों को मै बताता हूँ की मै १००-२०० कि.मी. बिना किसी विशेष कष्ट के साईकल भ्रमण कर सकता हूँ तो उनके चहरे पर अविश्वास की झलक रहती है। यह एक चिंता का विषय भी है। शहरी समाज अब मोटापे, मधुमेह और अन्य रोगों की चपेट मे पूरी तरह आ चुका है। साईकल चलाना अब स्टेटस के विरुद्ध है। देहात मे मेरी साईकल यात्रा को लोग आज भी समझते हैं। मध्य-प्रदेश के दमोह ज़िले के देहात मे एक सज्जन ने सटीक बात कही थी — ‘यह एक यात्रा है।’ भारत मे यात्रा का विशेष महत्व रहा है, लोग अपना घर बार बेच कर तीर्थ अथवा अन्य किसी लक्ष्य से यात्रा पर निकलते थे और कई एक बरस के बाद वापिस लौटते थे। आधुनिक भारत के काले अंग्रेज़ अब यह सब भूल चुके हैं, लेकिन देहातों मे अभी भी लोग इस परंपरा को मानते हैं।

२०१७ अक्तूबर तक मै कानपुर-प्रयागराज और वापिसी की यात्रा ( लगभग ४०० कि.मी. ) पूरी करने के पशचात ५०० कि.मी. की यात्रा का प्रोग्राम बनाने लगा। बुन्देलखंड के बीहड़ों का सौंदर्य के विषय मे मै यह कह सकता हूँ कि उत्तर-प्रदेश मे अगर कोई वन संपदा बची है तो इसमे बुन्देलखंड के बीहड़ एक बड़ा भाग हैं। मैने खजुराहो जाने का मन बनाया, जो कानपुर से लगभग ५०० कि.मी. की दूरी पर है। यह पूरी यात्रा बुन्देलखंड के बीहड़ों मे से होकर जाती है। कानपुर से हमीरपुर-महोबा-छ्तरपुर और फिर खजुराहो।

दिसम्बर, २०१७ तक मैने अपनी खजुराहो एवं पेंच की यात्राएँ पूरी कर ली थीं। दोनों यात्राएँ अलग हैं, खजुराहो की यात्रा से लौटने के कुछ समय बाद मैने पेंच की यात्रा आरम्भ की थी। 

खजुराहो और उसके भी आगे पेंच वन्यजीव अभ्यारण ( जो मध्य-प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर है ) की यात्राओं के पूरे लेख अभी लिखने बाकि हैं, परन्तु उनसे सम्बन्धित कुछ वीडियो और फोटो आपकी सेवा मे इस लेख मे डाल रहा हूँ। पेंच वन्यजीव अभ्यारण पहुँचने का रस्ता कानपुर से छतरपुर और फिर आगे दमोह, नरसिंघपुर और सिवनी जिला तक है। पेंच अभ्यारण सिवनी जिला, मध्य-प्रदेश मे ही है। कानपुर से पेंच के तुरिया गेट तक ७०० कि.मी. है, आना-जाना १४०० कि.मी पड़ेगा।

नीचे के फोटो व वीडियो कानपुर-खजुराहो मार्ग के हैं:

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हमीरपुर का यमुना पुल।

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 छतरपुर-खजुराहो मार्ग।

खजुराहो के पास रानेह झरना जो रानेह वन्य अभ्यारण क्षेत्र मे आता है।

आगे के फोटो कानपुर-पेंच मार्ग के हैं:

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बतियागढ़, दमोह के पहिले एक पहाढ़ी क्षेत्र है, यहाँ के एक ढ़ाबे मे पड़ाव डाला था।

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लखनादौन, सिवनी जिले के पास वन्य खेत्र मे सूखा नाला, इस खेत्र मे सूखे की मार का आभास हुआ।

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पेंच वन्य अभ्यारण मे एक सरकारी चेतावनी पटल। इसमे लिखा है कि बंदरों को खाना देना एक दंडनीय अपराध है।

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बतियागढ़ के वन खेत्र मे मेरी रेंजर साईकल।

 

2 Thoughts

  1. Its really very commendable that you are following this hobby of cycling with so much of enthusiasm. It must be really tough to rough out amongst all kinds of odds one faces travelling alone in areas where you do not expect any facility to travellers like you.

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