ओरछा तक की साईकल यात्रा

ओरछा के इतिहास और उसकी गाथाएँ तो मैने सुनी थी परन्तु वहाँ जाने का सुअवसर नहीं मिला था। ओरछा एक रोमाँचक नगर है, जो ११०० फुट की पहड़ी  पर बसा है, इसके चहुँ ओर वनक्षेत्र है और बेतवा नदी का किनारा है। इसका इतिहास बहुत पुराना है, आज भी नगर के भीतर पौरानिक काल के किले, मंदिर और खण्डहर दिखायी देते हैं।

कानपुर से ओरछा की दूरी लगभग २५० कि.मी. है और इसे तय करने के लिये साईकल से दो दिन का समय लगता है जिसमे एक रात का विश्राम भी है।

कानपुर से ओरछा का रास्ता

रास्ता राष्ट्रीय राजमार्ग से होकर जाता है, इसी कारण मैने अपनी रेसिंग साईकल ले जाने का मन बनाया। कालपी के शहर को छोड़ रास्ता बहुत ही आरामदायक रहा। कालपी मे सड़क नाम मात्र की है और वहाँ हमेशा जाम लगा रहता है। मै सुबह करीब ६-७ बजे निकलता था और ४-५ बजे शाम को सड़क से सटे किसी ढ़ाबे मे अपनी यात्रा शेष करता था। दिन भर मे १२०-१३० कि.मी. का रास्ता तय करता था। अपने साथ रात काटने के लिये बेड और कपड़े लत्ते भी लेकर चला था। १६ दिसम्बर, २०१८, सुबह ६ बजे मैने प्रस्थान किया और २० दिसम्बर संध्या को लगभग ६ बजे मै कानपुर वापिस आ गया।

बाँय चित्र ओरई से ओरछा राजमार्ग सुबह ६ बजे का है, और दूसरा ओरछा से १०० कि.मी. दूर एक ढ़ाबे पर खड़ी मेरी साईकल का है।

ओरछा शहर का द्वार भी पुरातन काल का है, और इसके चहुँ ओर एक पुरानिक दीवार भी है जो जगह-जगह से टूटी है। शहर छोटा है और इसकी गलियाँ सकरी हैं। सबसे भव्य पौरानिक भवन ओरछा का किला है, इसके साथ बेतवा नदी के किनारे १५ राजाओं की छतरी है और रामराजा मंदिर है। ओरछा को रामराजा नगर भी कहा जाता है। ओरछा का गुलकंद और पेड़ा भी बहुत स्वादिष्ट है, निम्नलिखित चित्र देखें:

ओरछा मे अनेक धर्मशालाएँ एवं होटल हैं, जो साफ सुथरे हैं। पूरा नगर लगभग ३ कि.मी. के अंदर बसा हुआ है और आप इसका पैदल ही भ्रमण कर सकते हैं।

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क्रमानुसार: ओरछा का नया रामराजा मंदिर परिसर, ओरछा नगर की गलियाँ, राजाओं की छत्री, राजा मधुकर शाह की छत्री।

राजाओं की छत्री बेतवा किनारे स्थित हैं, ओरछा का किला बेतवा नदी के पार है। किले का परिसर बड़े क्षेत्रफल मे फैला हुआ है।

क्रमानुसार: ओरछा किले को जाने का पुरातनकालीन पुल, किले के अंदर मुख्य द्वार, जहाँगीर महल एवं महल के स्तम्भों पर सुंदर हाथी बने हुए।

एक दिन भ्रमण के बाद मैं १९ दिसम्बर को सुबह ६:३० बजे कानपुर के लिए चल दिया।  निम्नअंकित चित्रों मे पहिला मेरा है और दूसरा ओरछा के बाहर वन क्षेत्र का है।

वापिसी ठीक-ठाक रही, केवल कालपी मे कुछ परिश्रम करना पड़ा, कानपुर से ६० कि.मी. दूर से ही सड़क यातायात बहुत अधिक हो गया और कानपुर के भीतर वही यातायात की मारा-मारी रही। यहाँ मै यह कहना चाहूँगा कि हमारे शहरों का यातायात बहुत अनियंत्रित और असुरक्षित होता जा रहा है। ऐसे मे साईकल चलाने वालों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिये।

 इति।

अंडमान — धर्ती पर स्वर्ग

अंग्रेज़ शासकों की क्रूरता इतिहास के पन्नों मे समा गयी है — यह वाक्य अतीत के पन्नों मे से होकर अंडमान द्वीप के पोर्ट ब्लेयर स्थित सेल्युलर जेल मे जैसे झूठा सा हो जाता है। अगर आप अंडमान-निकोबार ( संक्षेप मे अंडमान ) के रमणीय टापूओं को पर्यटन की दृष्टि से देखें, तो यह कहना अनुचित न होगा कि अंडमान भारत का एक अनमोल मोती है। सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से भी अंडमान का महत्व बहुत बड़ा है। पिछ्ले वर्ष समुद्री गोताखोरी के सिलसिले मे मुझे अंडमान घूमने का अवसर मिला था।

अंडमान द्वीप समूह केंद्र शासित प्रदेश है और इसकी राजधानी पोर्ट ब्लेयर किसी आधुनिक नगर से कम नही है। अंडमान द्वीप पहुँचने के लिये भार्तीय महासमूह से सागर अथवा हवाई रास्ते से होकर आया जा सकता है। पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर हवाई अड्डा अंडमान का एकमात्र हवाई अड्डा है।

IMG_20170406_104036                                         हवाई यात्रा — अंडमान आते वक्त दीपों का सुंदर दृश्य

अंडमान मे कई एक टापू हैं। यहाँ कई वन जनजातियाँ भी हैं जो सैकड़ों वर्षों से यहाँ निवास कर रहीं हैं। इन आदिवासियों को सरकारी संरक्षण प्राप्त है जैसे की सेंटिनेल, ओंगोनेल और जरावा जन जातियाँ। अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर मे सेल्युलर जेल काला पानी के भयावह इतिहास को एक बार फिर सजीव कर देता है।

IMG_20170412_161211                                                       सेल्युलर जेल के अंदर का दृश्य

सेल्युलर जेल अवशय देखें और अपने वीर स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को नमन करें। पोर्ट ब्लेयर के निकट चिड़िया टापू है, जो वन जीव अभ्यारण भी है, इसके अलावा पोर्ट ब्लेयर से हवेलोक और नील द्वीपों के लिये आधुनिक नौकायान उप्लब्ध हैं। यह फीनिक्स बंदरगाह से नीयमित समय पर इन द्वीपों के लिये प्रस्थान करते हैं।

समुद्री गोताखोरी के लिये हवेलोक टापू मे कई एक प्रक्षिण केंद्र हैं, मैने अपना आरम्भिक गोताखोरी प्रक्षिण यहीं से उत्तीर्ण किया था। इसके अलावा हवेलोक मे समुद्री मोटरबोट सैर, हेलिकोप्टर सैर और वन क्षेत्र का भ्रमण भी किया जा सकता है।

IMG_20170408_061332                            समुद्री गोताखोरी के लिये नाँव पर ओक्सिजेन सिलिंडर चढ़ाये जा रहे हैं

यह मै अवश्य कहना चाहूँगा कि अंडमान आना-जाना और वहाँ ठहरना आपको महँगा पड़ सकता है; अगर आप अकस्मात ही वहाँ जाने की योजना बनायें। २-३ महीने पहिले से अगर आप अपना प्रोग्राम बना ले तो यह बजट मे पूरा हो सकता है।

                               हवेलोक द्वीप के निकट समुद्री गोताखोरी का मेरा एक संक्षिप्त वीडियो

अब और क्या कहुँ ? अगर हो सके तो अंडमान घूमने का प्रोग्राम अवशय बनायें।

दूसरी साईकल का परिचय

पहली रेंजर साईकल से आपका परिचय तो हो चुका होगा, आईये अब आपका परिचय अपनी दूसरी साईकल से करवाता हूँ, यह रेसिंग साईकल है और रेंजर से काफी हल्की भी है:

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विश्व प्रसिद्ध सुन्दरी यानि मेरी रेसिंग साईकल।

आज ही के दिन का फोटो है भाई, इसी वास्ते आज निकला था। इस साईकल मे कोई गीयर नहीं था, गीयर मैने लगाये हैं। अब इसमे २१ गीयर हैं, पेडल भी बदल दिये हैं, बाकि आपको तो सब दीख ही रहा है। इस साईकल मे गति तो है परन्तु इसके टायर पतले होने के कारण सड़क पर पकड़ भी कम है और बजरी-रोड़ी इत्यादि मे इसे सम्भालने मे पसीने छूट जाते हैं। अच्छी सड़क पर यह पानी की तरह चलती है लेकिन गड्ढ़ों और मट्टी मे यह लड़खड़ाने लगती है। इस पर अधिकतम ४०० कि.मी. की दूरी तय कर चुका हूँ लेकिन इसमे कुछ न कुछ समस्या इसलिये भी बन जाती है कि इसका फ्रेम हल्का है और ऊबड़-खाबड़ सड़कों के झटकों से यह बिगड़ने लगती है। सच कहुँ तो यह मक्खन जैसी चिकनी सड़कों के लिये ही बनी है। हैंडल नीचे की ओर मुड़ा है और अगर हेंडल के निचले भाग में पकड़ बनायें तो ४० कि.मी. प्रति घँटे की गति कुछ वक्त तक बनायी जा सकती है। हैंडल के नीचे सिरे को पकड़ने पर सर भी झुक जाता है और आप हवा को चीरते हुये निकल जाते हैं। पर अगर उल्टी दिशा से कोई वाहन आपकी तरफ आ रहा है तो आपको बारम बार सर उठा कर उसको ताकना होगा और लम्बी दूरी मे यह समस्या बन जाती है। शहर की धमाचौकड़ी मे तो इसे चलाना कष्टदायी है क्योंकि बार बार ब्रेक लेना और हैंडल मोड़ने पर इसमे संतुलन बिगड़ जाता है। राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर के राजमार्गों पर इसे दौड़ाने का आनन्द ही कुछ और है।

मेरी एक अन्य रुची भी है, यानि लोगों द्वारा सड़कों किनारे फेंका गया कूड़ा बटोरना और उसे उपयोग मे लाना। इसमे प्लास्टिक की बोतलें, बीयर के कैन और अन्य सामग्री भी है। यह काम मैने इसलिये आरम्भ किया क्योंकि सुंदर जलाशयों के किनारे, वन-जंगल के सड़क किनारे लोग बेछिटक होकर अपनी गाड़ियों मे से कूड़ा फेंक देते हैं और इससे मुझे बड़ी उदासी हो जाती थी। साईकल की कई एक फोटो मे यह कूड़ा दिखाई देता है, लेकिन वह फोटो मै इंटरनेट पर इसलिये नहीं डालता क्योंकि विश्व भर के लोग इनको देखकर हमारे देशवासियों को ही कोसेंगे। अगली फोटो मे आपको प्लास्टिक की एक थैली घाँस मे चिपकी सी दिखेगी, यह पीछे के टायर से जैसे लगी हुई है। इस मनोरम स्थान मे भी प्लास्टिक का कूड़ा देखकर मन तो खराब हुआ और फोटो भी, कूड़ा सफा करने के बाद फोटो खींचते वक्त एक प्लास्टिक थैली उड़ कर आ लगी।

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सुंदर छटाओं मे कूड़े का तड़का। गोलाकार लाल निशान देखें।

आगे का वीडियो भी इसी जलाशय का है, वीडियो मे थोड़ा कम्पन है इसके लिये क्षमा चाहूँगा। वीडियो ऐसे खींचा है की इस जलाशय के किनारे फेंका गया कूड़ा न दिखे।

कानपुर से १० कि.मी. बाहर देहात का सुंदर जलाशय।

आगे के लेखों को भी पढ़ना न भूलिएगा, ऐसे ही लिखता रहूँगा।

घुम्मक्कड़ी साईकल

साईकल की कला समझने के बाद मानो मुझे पर लग गये थे। ऐसा लगता था की अब तो बस ब्रम्हाण ही मेरी मुट्ठी मे समा गया हो। मैने हर हफ्ते १-२ लम्बी दूरी की साईकल यात्राएँ आरम्भ कर दीं। अब मै अपनी मस्त चाल मे देहात की अपेक्षाकृत स्वच्छ वायु का आनन्द ले सकता था। २०१७ मे शीत काल के आते-आते कई सौ किलोमीटर की दूरी पूरी कर चुका था। आरम्भ मे तो आस पास के छोटे कस्बो मे मेरी लम्बी दूरी की साईकल यात्रा को देख कर लोगों को बड़ा कौतूहल होता था, लेकिन अब मेरी सवारी को लगभग कानपुर के आस पास सभी ढ़ाबे और साईकल वाले पहचानने लगे हैं। 

सवाल भी बड़े हास्यास्पद होते हैं। ‘आपको क्या सरकार साईकल पर घूमने का पैसा देती है ?’ ‘यह क्या कोई नई कम्पनी की साईकल का प्रदर्शन है ?’ ‘तुम क्या साईकल किसी संदेश का प्रचार करने को चलाते हो ?’ शहरों और कस्बों मे जब जवान बच्चों को मै बताता हूँ की मै १००-२०० कि.मी. बिना किसी विशेष कष्ट के साईकल भ्रमण कर सकता हूँ तो उनके चहरे पर अविश्वास की झलक रहती है। यह एक चिंता का विषय भी है। शहरी समाज अब मोटापे, मधुमेह और अन्य रोगों की चपेट मे पूरी तरह आ चुका है। साईकल चलाना अब स्टेटस के विरुद्ध है। देहात मे मेरी साईकल यात्रा को लोग आज भी समझते हैं। मध्य-प्रदेश के दमोह ज़िले के देहात मे एक सज्जन ने सटीक बात कही थी — ‘यह एक यात्रा है।’ भारत मे यात्रा का विशेष महत्व रहा है, लोग अपना घर बार बेच कर तीर्थ अथवा अन्य किसी लक्ष्य से यात्रा पर निकलते थे और कई एक बरस के बाद वापिस लौटते थे। आधुनिक भारत के काले अंग्रेज़ अब यह सब भूल चुके हैं, लेकिन देहातों मे अभी भी लोग इस परंपरा को मानते हैं।

२०१७ अक्तूबर तक मै कानपुर-प्रयागराज और वापिसी की यात्रा ( लगभग ४०० कि.मी. ) पूरी करने के पशचात ५०० कि.मी. की यात्रा का प्रोग्राम बनाने लगा। बुन्देलखंड के बीहड़ों का सौंदर्य के विषय मे मै यह कह सकता हूँ कि उत्तर-प्रदेश मे अगर कोई वन संपदा बची है तो इसमे बुन्देलखंड के बीहड़ एक बड़ा भाग हैं। मैने खजुराहो जाने का मन बनाया, जो कानपुर से लगभग ५०० कि.मी. की दूरी पर है। यह पूरी यात्रा बुन्देलखंड के बीहड़ों मे से होकर जाती है। कानपुर से हमीरपुर-महोबा-छ्तरपुर और फिर खजुराहो।

दिसम्बर, २०१७ तक मैने अपनी खजुराहो एवं पेंच की यात्राएँ पूरी कर ली थीं। दोनों यात्राएँ अलग हैं, खजुराहो की यात्रा से लौटने के कुछ समय बाद मैने पेंच की यात्रा आरम्भ की थी। 

खजुराहो और उसके भी आगे पेंच वन्यजीव अभ्यारण ( जो मध्य-प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर है ) की यात्राओं के पूरे लेख अभी लिखने बाकि हैं, परन्तु उनसे सम्बन्धित कुछ वीडियो और फोटो आपकी सेवा मे इस लेख मे डाल रहा हूँ। पेंच वन्यजीव अभ्यारण पहुँचने का रस्ता कानपुर से छतरपुर और फिर आगे दमोह, नरसिंघपुर और सिवनी जिला तक है। पेंच अभ्यारण सिवनी जिला, मध्य-प्रदेश मे ही है। कानपुर से पेंच के तुरिया गेट तक ७०० कि.मी. है, आना-जाना १४०० कि.मी पड़ेगा।

नीचे के फोटो व वीडियो कानपुर-खजुराहो मार्ग के हैं:

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हमीरपुर का यमुना पुल।

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 छतरपुर-खजुराहो मार्ग।

खजुराहो के पास रानेह झरना जो रानेह वन्य अभ्यारण क्षेत्र मे आता है।

आगे के फोटो कानपुर-पेंच मार्ग के हैं:

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बतियागढ़, दमोह के पहिले एक पहाढ़ी क्षेत्र है, यहाँ के एक ढ़ाबे मे पड़ाव डाला था।

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लखनादौन, सिवनी जिले के पास वन्य खेत्र मे सूखा नाला, इस खेत्र मे सूखे की मार का आभास हुआ।

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पेंच वन्य अभ्यारण मे एक सरकारी चेतावनी पटल। इसमे लिखा है कि बंदरों को खाना देना एक दंडनीय अपराध है।

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बतियागढ़ के वन खेत्र मे मेरी रेंजर साईकल।

 

मेरा साईकल प्रेम

कुछ वर्ष पूर्व रोग और मोटापे से जूझते जूझते आयुर्वेद का सहारा मिला और गुणवान आयुर्वेदाचार्यों के मार्गदर्शन से मेरा जीवन पूर्णत: प्रभावित हो गया है। इस संदर्भ मे मैं कानपुर के त्रिपाठी औषधालय, परमठ, कानपुर का विशेष तौर से आभारी हूँ। एक समय ऐसा भी था जब मेरा निज भार ११० किलो के ऊपर था, हर एक कदम पर साँस फूलता था और हर दिन दवा और सूई के सहारे पार पाता था। आज मै एक ऐसा नौजवान हूँ, जो कई सौ किलोमीटर साईकल चलाने पर भी नहीं थकता और २०-३० किलोमीटर की दौड़ मे भाग लेता हूँ। मेरी आयु ४८ वर्ष है और भार लगभग ७५ किलो और मेरा निवास खास कानपुर शहर मे है।

आयुर्वेदाचार्यों के मार्गदर्शन से यह ज्ञान प्राप्त हुआ की एक भिक्षूक समान सादगी से भरा जीवन ही स्वस्थता का मूल मंत्र है। भोजन जितना सादा हो, उतना ही पाचन योग्य होता है और पाचन ही जीवन है। कूलर, ए.सी. एवं फ्रिज स्वास्थ के लिये ठीक नहीं हैं, और फ़ास्ट फूड तो अतयन्त हानिकारक होता है। २०१५ मे मैने आयुर्वेद को अपनाया, आयुर्वेद एक जीवन शैली है, और कुल ६-८ महीने के अंदर ही मै ११० किलो से ८० किलो पहुंच गया, मैने दौड़ना और साईकल चलाना भी इसी वक्त आरम्भ किया। दौड़ने से कुछ चोट आई जिसके उपरान्त मैने साईकल पर विशेष ध्यान दिया।

साईकल का किस्सा बड़ा हास्यास्पद है। जब मैने साईकल लेने का मन बनाया तो घर वालों और रिश्ते-नातेदारों को जैसे सांप सूंघ गया, हमारे शहरी समाज मे साईकल पर चलना स्टेटस को नीचे करने के जैसा है। परन्तु मै नही माना और लगभग पांच हज़ार रुपय की रेंजर साईकल खरीद ली। यह बात २०१६ की है, तब मै साईकल का क,ख,ग, नही जानता था और बड़ा साहस करके १०-२० किलोमीटर का सफर तय कर पाता था। ऐसे मे मैने अपनी रेंजर मे गीयर भी लगवा लिये परन्तु इनका सही उपयोग सीखने मे ४-६ महीने का कठिन परिश्रम करना पड़ा। बीच-बीच मे गीयर टूट भी जाते थे और बनवाने का १२००/- रुपल्ली लगता था, धीरे-धीरे मैने यू-ट्यूब और अन्य मध्यमो की सहायता से स्वयं ही गीयर ठीक करना जान लिया। 

देसी गीयर के पूरे सामान का मूल्य ५००/- से १०००/- रुपये था, जापानी शिमानो अथवा विदेशी गीयर का पूरा सामान १०,००० /- से लेकर १,००,०००/- रुपये तक का होता था। ऐसे मे मै देशी और विदेशी गीयर के सामान को मिश्रित करके अपनी साईकल को चलाने लगा। यह सब काम जानने के बाद मुझे साईकल से ऐसा प्रेम हो गया की जिसका वर्णन करना कठिन है। अपनी साईकल से न तो विषाक्त धूएं का उत्सर्जन होता है और न ही वो तीव्र गति जिससे सड़क हादसे होते रहते हैं, मोटापा भी दूर भागने लगता है। अब और क्या कहूँ ? धीरे-धीरे टायर पंचर बनाना भी सीख गया और पुरी साईकल खोल कर उसके एक-एक अंजर-पंजर को बदलना या तेल-ग्रीस डालना और सफाई करने की कला मे भी निपुण हो गया। इस कार्य मे पास ही के देसी साईकल मिस्त्रीयों का भी कुछ सहयोग मिला।

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मेरी रेंजर गाड़ी जिसका पूरी तरह रूपान्तरण हो चुका है।

अब मेरे सफर ४०-८० कि.मी. तक होने लगे थे, अधिक्तम गति भी ३०-४० कि.मी. प्रति घँटे की होने लगी। गति बढ़ाने के लिये मैने एक और हल्की रेसिंग साईकल लगभग ५०००/- रुपये मे ले ली। इसमे भी आरम्भ मे ६ और फिर २१ गीयर लगवा लिये। अब मै १००-२०० कि.मी. की दूरी एक ही दिन मे करने लगा, और मेरी अधिकतम गति भी ४०-४५ कि.मी. प्रति घँटा हो गयी थी। ऐसे मे २०१७ के आते आते मैने कानपुर के आस पास के शहरो मे साईकल से जाना आरम्भ किया। इस श्रेणी मे मैने लखनऊ, कन्नौज और फतेहपुर को अपनी साईकलों की पहुँच मे लिया, फिर दायरा और बढ़ाया और प्रयागराज, हमीरपुर और आगे के गाँव और कसबों तक जाने लगा। बुँदेलखण्ड से मेरा विशेष लगाव रहा था और मैने अपना पहली बड़ी यात्रा मे मध्य-प्रदेश के खजुराहो जाने का प्रोग्राम बनाया। यह कोई संयोग नही था कि खजुराहो तक पहुँचने के लिये मुझे बुँदेलखण्ड के मध्य से जाना था। 

खजुराहो और उससे भी आगे महाराष्ट्र तक के साईकल सफर के किस्से मेरे अन्य लेखों मे पढ़ें।